ऐसा प्रचार जो जान ले

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कलियुग में धर्म का प्रचार करने वाला हर जगह छा रहा है। चाहे वो कोई भी धर्म हो। धर्म का ठेकेदार यही कहता है हमारा धर्मांतरण से कोई लेना देना नहीं है। लोगों को एकत्र करके प्रवचन देते हैं लेकिन जो धार्मिक पुस्तकों में जो लिखा है उस पर अमल नहीं करते। अगर अमल करते तो आज खासकर भारत में महामारी ऐसा उग्र रूप धारण नहीं करती जैसा निजामुद्दीन मरकज़ में तबलीगी जमात से हुआ। देश में अब तक 41 लोगों की मौत हो गई और 2000 से अधिक इस महामारी की चपेट में आ गए।

दो टूक लिखता हूं और स्पष्ट विचार रखता हूं। चीन से शुरू हुआ कोरोना वाइरस दुनिया के 200 देशों में हाहाकार मचा रहा है। भारत में इसकी शुरुआत हुई। लॉक डाउन हुआ। दिल्ली में तबलीगी जमात में इस्लाम धर्म के प्रचार के लिए निजामुद्दीन में तबलीगी जमात का आयोजन हुआ। 1000 की सामर्थ्य वाली निजामुद्दीन मरकज़ में 8000 लोगों ने शिरकत की। जमात में कई देशों से लोग आये, वह भी उस समय जब उन्हीं के देश में कोरोना वाइरस फैल गया था। वह इस बीमारी से संक्रमित हो गए। दिल्ली का प्रशासन मौलानाओं को समझा रहा था। फिर भी कोई सुधार नहीं आया। लोग इसके अंदर खाने शिकार हो रहे थे और मजहबी ठेकेदार जन्नत का ख्वाब लोगों को दिखा रहे थे। इस बीमारी से पीड़ित लोगों की मौत के बाद पता चला वह जमात से आये थे। देश के कौने कौने में हड़कंप मच गया। सरकार को धमकाने वाला मौलाना अब गायब हो गया। अब वहां से यह सभी जमाती 40 दिन पूरा करने के लिए अन्य मस्जिदों में आ गए और इस भयंकर बीमारी में सुधार की बजाय अन्य लोगों में बीमारी का न्यौता दे गये। लोग इस मामले को छुपाने के लिए कई तरह के प्रपंच रच रहे हैं। इनको घर तक पहुंचाने की व्यवस्था नहीं की। इस्लाम का प्रचार करने आये।उन लोगों को नहीं देखा जो दो वक्त की रोटी के लिए परिवार सहित साइकिल और पैदल चल कर अपने घर तक गये।

ऐसा कैसा प्रचार प्रसार जहां उन्हीं के देश में और पड़ोस में लोग बीमारी से जूझ रहे हैं। मौत से लड़ रहे और काल के गाल में समा गए। कुरआन को मैंने पढ़ा है जिसकी शुरुआत में ऊपर वाले ने कहा है पडौसी के दुःख में उसके दुख को दूर करो। कोई भूखा नहीं रहे। इससे मै खुश रहूंगा। जमाती अपने अपने देश में इसका उल्टा कर आये। अगर इस्लाम का प्रचार प्रसार करना था तो पहले अपने देश में कोरोना से पीड़ित लोगों की हिफाजत करने का प्रयास किया जाता। वहां भूखों का पेट भरते। इससे इस्लाम का प्रचार दुनिया के कोने में फैलता।  इसके विपरीत हुआ जमात में इस बीमारी के संक्रमण को फैलाया। जो लोग कह रहे हैं वाहन के अभावमें मस्जिदों में रुुुक गये तो वह दिल्ली के रहने वाले अलीगढ़ क्यों आये। जब सासनी तक आ गये तो मथुरा अपने घर क्यों नहीं गये, जो एक घण्टे का भी रास्ता नहीं है। इस समय नवरात्र चल रहे हैं। मन्दिर बन्द कर दिये गए हैं। इसके बाद भी मस्जिद में जमातियों का ठहराव हो रहा। हालांकि कई जगह मस्जिद बंद भी कर दी है। सिर्फ अजान होती है। देश में अधिकतर इस बीमारी से पीड़ित लोगों का आंकड़ा देख लो कौन और कैसे जिंदगी और मौत से जूझ रहा। वजह भी पता चलेगी।

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