कांग्रेस गम्भीर नहीं तेज तर्रार नेताओं पर

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कभी भारत के हर कौने पर परचम लहराने वाली कांग्रेस गिने चुने राज्यों में रह गई है। मध्यप्रदेश में सपा बसपा की बैसाखी पर चलने वाली सरकार के लिये विधानसभा में बहुमत जुटाना आसान नहीं होगा। पार्टी नेतृत्व समय के साथ परिवर्तन करता तो शायद ऐसी दुर्दशा नहीं होती।

कांग्रेस हाई कमान ने उन नेताओं का साथ नहीं छोड़ा है जो अनर्गल बयान देते हैं। उनमें पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी हैं। भोपाल से लोकसभा चुनाव हारने के बाद भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में ज्योति राज सिंधिया का पुरजोर विरोध किया। जबकि सिंधिया ने विधानसभा चुनाव में गांव गांव जाकर वोट मांगे। उसी का नतीजा रहा कांग्रेस मध्यप्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बतौर उभरी। सिंधिया ने चुनाव में राहुल गांधी का जो साथ दिया वह भी मिसाल है। अब भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। उस समय पत्रकार वार्ता में राहुल गांधी के खिलाफ कोई गलत शब्दों का प्रयोग नहीं किया। कांग्रेस हाईकमान को कई बार संकेत दिए थे कि वह नाराज चल रहे हैं। जैसे सीएए पर मोदी सरकार के फैसले को सही ठहराया गया। सिंधिया कोई ऐसे वैसे घराने से नहीं हैं। कांग्रेस में उनकी वफादारी पर सवाल उठाने वाले भूल रहे हैं वह हमेशा राहुल गांधी का साथ देते थे। राहुल गांधी ने भी हमेशा सिंधिया को अपने साथ रखा।ऐसे में कांग्रेस का फर्ज बनता था मुख्यमंत्री बनाने में सिंधिया को रखा जाता। इसका परिणाम मध्यप्रदेश के अलावा उत्तर भारत में पड़ता। भाजपा में कांग्रेस और अन्य दलों के नेता भी शामिल हुए हैं। ऐसी फुर्ती पहली बार देखी है अमित शाह से मुलाकात के बाद कुछ ही समय में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भेंट हुई। पत्रकार वार्ता के सात मिनट के बाद पार्टी ने उन्हें राज सभा का प्रत्याशी घोषित कर दिया। इससे यह भी स्पष्ट हो रहा सिंधिया को नये मंत्री मंडल में कैबिनेट की जगह मिलेगी।

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