कानपुर की घटना खोल रही है न्याय पालिका की पोल

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हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे 60 से अधिक जघन्य अपराधों का अपराधी आज हर किसी के लिए शैतान है। 1989 के बाद उत्तर प्रदेश अपराध की दुनिया में छाया। अपहरण से लेकर अवैध धंधा और मर्डर के सौदागर ब्लॉक प्रमुख, विधायक, सांसद और मंत्री जैसे अहम पड़ पर आसीन हो गए। पैसे के बल पर कानून अपराधियों की मुट्ठी में आ गया। सपा और बसपा सरकार में अपराधियों के हौसले बुलंद रहे। अब सवाल खड़ा हुआ है कानपुर में हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे को पुलिस की भनक कैसे लग गई ? ऐसे घातक हथियार कहां से आये? राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री कार्यकाल में दर्जा प्राप्त मंत्री की थाने में गोली मारकर हत्या करने के बाद आज तक कैसे जेल के बाहर रहा ? दो दूक कहुंगा और स्पष्ट लिखूंगा, पुलिस प्रशासन, सरकार और न्यायपालिका से इंसाफ नहीं मिल रहा है।

उत्तर प्रदेश में शुक्रवार का दिन काले दिनों के लिए याद रखा जाएगा। एक सीओ समेत 8 पुलिस कर्मी शहीद हो गए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक एक करोड़ रुपये पीड़ित परिवार के परिवार को देने की घोषणा कर दी है। इस घोषणा से ऐसे गम्भीर मुद्दे को दबाया नहीं जा सकता है। अधिकारियों को कानून व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए छूट दे रखी है। अफसोस यह है थाने दलालों से घिरे हुए हैं। अपराधी को पकड़ने पुलिस की खबर भी लीक हो जाती है। इसके लिए थाना भी दोषी है। हिस्ट्रीशीटर विकास दुबे जैसे अपराधियों के तार विधायक, सांसद और मंत्रियों से जुड़े हैं। ऐसे अपराधी मनचाहा थाना प्रभारी और कर्मचारियों की तैनाती करके अपना सिक्का बुलंद किये हुए हैं। एक केस में पुलिस गवाह बनी। बाद में मुकर गई। एक केस में आजीवन कारावास की सजा पाये हुए हैं। इसके बाद भी उसे पैरोल मिल गई। ऐसे जघन्य अपराध पर भी न्याय पालिका की खामोशी अपराध को बढ़ावा दे रही है। यह सबको पता है कोई भी सरकार आये अपराधियों को पार्टी बदलने में समय नही लगता है। थाना, ब्लॉक और जिला पंचायत अध्यक्ष कई गाड़ियों में असलाह लेकर चलते हैं। एक लम्बे समय से इन पदों पर धन और बलशाली आसीन हुए हैं।

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