कुछेक की वजह से पत्रकारिता बिगड़ी

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एक पत्रकार आज भी पत्रकार ही है। अभावों में जीवन व्यतीत करता है किंतु गर्व से रहता है। अपना और अपने परिवार का समय भी उसी जनता के सुख-दुख जानने और सामने लाने में लगा देता है जो कुछेक लोगों के कारण पूरी बिरादरी को दलाल, पत्तलकार और ना जाने किन-किन उपनामों से संबोधित करती है।
भाग-दौड़ में लगा रहता है, देश-दुनिया की खबर रखता है बस यही भूल जाता है कि उसका एक अपना परिवार भी है। बच्चे कब बड़े हुए, पता नहीं चलता.! वह अनमोल समय जिसपर उसके परिवार- उसके बच्चों का हक था, वह भी समाज को दे देता है। घर में आने-जाने का कोई नियत समय नहीं किंतु फिर भी लगा रहता है काम में।
हाँ ये वही पत्रकार है जिसकी उपस्थिति जनहित में सरकारी मशीनरी पर एक दवाब बनाकर रखती है। ये वही पत्रकार है जिसकी उपस्थिति के बिना ना तो पूरी समाजसेवा होती दिखती है, और ना हो कोई अन्य कार्यक्रम- क्योंकि मेनस्ट्रीम मीडिया में छपने/दिखने के शौक तो यही पत्रकार पूरा करवा पायेगा।
अपेक्षाएं एक पत्रकार से बहुत ज्यादा होती हैं, और उन्हें अपनी सामर्थ्यानुसार एक पत्रकार पूरी करने के प्रयास भी करता है। किंतु अब ना वो मीडिया हाउस रहे और ना ही मालिक जो एक पत्रकार को फ्री-हैंड दे सकें । फ्रीहैंड तो छोड़िए कहीं फंसने पर साथ भी दे पायें !
पत्रकार भी एक इंसान है, जिम्मेदारियां उसपर भी हैं अपने घर-परिवार की-संस्थान की- और समाज की। चाय का कप होठों से लगाये जितना आसान है एक पत्रकार की आलोचना करना, उतना ही मुश्किल है उसके जीवन-उसकी दिनचर्या को समझ पाना या उसे जी पाना ! दिन की शुरुआत भी दवाब के साथ और अंत भी। दिनभर चुनौतियों, रंजिशों, साजिशों और षड्यंत्रों से जूझता है- जीवन दाँव पर लगाता है। अस्त-व्यस्त दिनचर्या के कारण शरीर बीमारियों का घर जैसा बन जाता है किंतु फिर भी काम चालू रहता है। हर कोई यहाँ करोड़ों-अरबों नहीं कमाता जो तमाम सुख सुविधाओं का उपभोग कर पाए। नौकरी में स्थायित्व नहीं, टेंशन ज़बरदस्त !!
कुकुरमुत्तों की तरह उग आए कथित जनसरोकारी मीडिया संस्थानों ने हालत और हालात खराब किये हैं। निजी हितों को साधने के लिए मिशन से एक व्यवसाय में बदल दिया इन्होंने #पत्रकारिता को और निशाने पर आया सिर्फ एक मुलाजिम जिसे तमगा मिला है #पत्रकार !

विनोद भारद्वाज

वरिष्ठ पत्रकार

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