नरभक्षी में तब्दील हो गए दिल्ली के दंगाई

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एक लम्बे समय से दिल्ली में चल रहा आंदोलन हिंसा में तब्दील हो गया है। इस चिंगारी को समय पर सम्भाल पर लिया जाता है तो एक पुलिस कर्मी सहित 11 लोगों की जान बचाई जा सकती थी। चालीस से ज्यादा घायल लोगों की संख्या कम हो सकती थी। ऐसा प्रतीत होता है किसत्ता में आसीन नेताओं ने भी इस गम्भीर आंदोलन को गम्भीरता से नहीं लिया। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के भारत आगमन पर हुई हिंसा से कई सवाल खड़े हुए हैं।

शाहीन बाग में चल रहा आंदोलन दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले चल रहा था। इस आंदोलन को वोट की खातिर पक्ष और विपक्ष के नेता भुनाने के लिए एक दूसरे पर हाथ रखते हुए। दोनों ओर से हिंसा के लिए भाषण होते रहे हैं। शाहीन बाग के धरना प्रदर्शन का असर समूचे देश में हुआ। प्रदर्शन का विरोध भी हुआ। नतीजा यह हुआ प्रदर्शन का पक्ष और विपक्ष लगभग दो समुदायों में बंट गया। सभी को स्पष्ट दिखाई दे रहा था इस धरना प्रदर्शन का असर कभी भी सड़क पर आ सकता है। इसके बावजूद चुप्पी साधना स्पष्ट करती है दिल्ली पुलिस ने दोनों ओर से भड़काने वालों पर नकेल नहीं कसी है। शाहीन बाग पर बैठे लोगों का भी दायित्व बनता था उपद्रवियों को अलग रखना चाहिए। उपद्रव ऐसे कब में हुआ जब अमेरिका के राष्ट्रपति भारत यात्रा पर आए। ऐसे समय में दंगियों ने लोगों के घर, दुकान और गैसोलीन पाइप को आग के हवाले कर दिया। पुलिस दबंगों को सबक सिखाने वाली थी। पुलिस लाचार बनी रही। पथराव होता है। राहगीर भी उपद्रवियों के शिकार हुए। ये दंगियाँ को नरभक्षी भी कहा जाए तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

मैंने फेसबुक और मीडिया पर देखा पक्ष को छोड़कर विपक्ष के सभी प्रमुखों ने इस आगमन पर जमकर तंज कसे। ऐसा प्रतीत होता है जब कोई भी सत्ता में होता है विपक्ष को उसका सही भी गलत रास आता है। लोगों की ऐसी एकता दिवालियापन जाहिर नज़र आती है।

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