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अलीगढ़ 27 जुलाईः महात्मा गांधी का अहिंसा का पाठ सभी धर्मो का अभिन्न अंग है और उन्होंने इसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक प्रमुख हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। यह उद्गार अमेरिका की मिशिगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माधव देश पांडे ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आन लाइन व्याख्यान के दौरान व्यक्त किये।
प्रोफेसर देश पांडे ए0एम0यू0 द्वारा महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती के अवसर पर महात्मा गांधी के विचार और दर्शन व्याख्यान श्रंखला के अंतर्गत प्रथम व्याख्यान प्रस्तुत कर रहे थे। जिसका विषय था श्महात्मा गांधी भागवत गीता और सभी धर्मो का उनका बोधश्। केन्द्रीय वक्तय में प्रोफेसर देश पांडे ने इस बात पर बल दिया कि हिन्दुत्वए इस्लाम और इसाईयत तथा अन्य धर्मो के विभिन्न धर्म ग्रंथों ने गांधी जी के चरित्र का निर्धारण किया और उनके जीवन को गहनता से और स्थायी रूप से परिवर्तित किया। प्रोफेसर देश पांडे ने कहा कि धर्म ग्रंथों के अध्ययन का क्रम भगवत गीता से आरंभ हुआ जो उनके लिए शक्ति और सांत्वना का अचूक स्रोत बन गया। उनके इस पुस्तक तक पहुॅचने की यह एक दिलचस्प कहानी है।
प्रोफेसर देश पांडे ने आगे कहा कि गांधी जी के ब्रहमविद्यावादी मित्र आॅलकोट बंधु.गीता के मूल संस्कृत पाठ का एडमिन आर्नल्ड के अंग्रेजी अनुवाद सहित अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने यह सोचते हुए गांधी जी को आमंत्रित किया कि भारतीय होने के नाते वह संभवतः संस्कृत को भलीभांति जानते होंगे। उन्होंने गांजी जी से कुछ संस्कृत शब्दों के अर्थ के बारे में परामर्श किया। किन्तु वे मदद नहीं कर सके। उन्होंने कहा कि गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया है कि उन्हें बेहद शर्मिदगी हुई कि उन्होंने न तो संस्कृत में और नाहीं गुजराती में इस दैवीय काव्य को पढ़ाया ;संस्करण 1948 पृष्ठ 90द्ध। प्रोफेसर देश पांडे ने स्पष्ट किया कि गांधी जी अपने अज्ञान को अंगभीरता से लेने वाले नहीं थे। गांधी जी ने अपनी शर्मिदगी को सशक्त प्रेरणा में और न केवल संस्कृत में गीता बल्कि बाईबिलए कुरान आदि संस्करण के बड़े धर्मो के धर्म ग्रंथों का भी अध्ययन किया। 
प्रोफेसर देश पांडे ने विस्तार से बताया कि गांधी जी ने अहिंसा का सारतत्व गीत और दूसरे धार्मिक ग्रंथों में खोजा और इस निष्कर्ष पर पहुॅचे कि सभी धर्म सीधे रास्ते की ओर ले जाते हैं। यहाॅ तक कि गांधी जी की सामुदायिक प्रार्थनाओं में विभिन्न आस्थाओं की धार्मिक पुस्तकों के छंदों का पाठ किया जाता था। 
उन्होंने कहा कि गांधी जी इन विचार सरर्णियों पर निर्भीकतापूर्वक डटे रहे और संसार भर की अनेक पीढ़ियों को प्रेरित किया। उनके विचार और चिंतन केवल भारतीय स्वाधीनता आंदोलन के केन्द्र में ही नहीं रहे बल्कि विभिन्न देशों की दमनकारी सत्ताओं के विरूद्ध नागरिक अधिकारों के आंदोलनों की आधारशिला बने। 
उद्घाटन भाषण मंे ए0एम0यू0 कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर ने कहा कि गांधी जी ने कभी एज्याध्यक्ष नहीं बनना चाहा और एक धर्मपरायण हिन्दू के रूप में वो सभी धर्मो के लोगों को सद्भाव से जीते देखना चाहते थे। यही वह बात है जो उनको महानतम नेताओं में से एक बनाती है। कुलपति ने कहा कि गांधी जी ने राजनीति में धर्म का सवावेश सदइच्छा से किया था। उन्हांेंने  खिलाफत आंदोलन का नेतृत्व किया और वो धर्म के आधार पर देश के विभाजन को टालना चाहते थे। 
अतिथि वक्ता का परिचय भाषा विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर एम0जे0 वारसी ने कराते हुए प्रोफेसर देश पांडे की विद्वता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्रोफेसर देश पांडे के शोध कार्य के विषय संस्कृत व्याकरण परम्पराएभारतीय आर्य भाषाओं का ऐतिहासिक और समाज शास्त्रीय भाषा वैज्ञानिक अध्ययन तथा भारत की धार्मिक और दार्शनिक परम्परायें हैं। 
प्रोफेसर मुहम्मद अब्दुस सलाम ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया और कार्यक्रम का संचालन किया। प्रोफेसर एम0 रिजवान खान ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। इस व्याख्यानमाला का अगला व्याख्यान आक्सफोर्स विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फैसल देव जी गांधी जी का मौन विषय 

अलीगढ़ 27 जुलाईः लाॅ सोसाइटीए विधि विभागए अमुवि तथा एम0बी0सी0 मैंनेजमेंट कंसल्टेन्टए स्विटजरलेण्ड द्वारा संयुक्त रूप से श्सिविल सोसाइटी तथा समकालीन विधिक चुनौतियाॅश् नामक विषय पर सफलतापूर्वक अंतर्राष्ट्रीय आगासी सम्मेलन का आयोजन किया गया।
सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए अमुवि कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर ने कहा कि जनतंत्र का अर्थ मात्र मतदान के अधिकार से नहीं है। बल्कि यह हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग है तथा जनतंत्र में मीडिया की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। चाहे वह प्रिंट मीडिया हो अथवा इलैक्ट्रोनिक। उन्होंने कहा कि मीडियाए न्यायपालिका तथा स्वायन्त संस्थायें जैसे निर्वाचन आयोग आदि हमारे जनतंत्र का आधार है। उन्होंने आगे कहा कि हम भारतीय भाग्यशाली हैं कि हमारे यहाॅ एक जीवंत जनतंत्र है। हमारे पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है तथा हमें उसका सम्मान करना चाहिए। कोरोना महामारी के कारण अनेक वादों की सुनवाई न्यायपालिका द्वारा नहीं हो पा रही है तथा यह आज की समकालीन चुनौतियों का बहुत बड़ा कारण है।
सम्मेलन के अध्यक्ष तथा सह.आयोजक डा0 मारियो बोरिस क्यूराटोलोए सी0ई0ओ0एएम0बी0सी0 मैंनेजमेंट कन्सलटेंट स्वीटजरलैंड नेे प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हंुए कहा कि हमें आज एक लचीला रूख अपनाने की आवश्यकता है। सिर्फ कानून में ही बदलाव की आवश्यकता नहीं किन्तु बदलते समय के साथ उसके कार्यान्वयन में भी परिवर्तन की आवश्यकता है। उन्होंने यह भी कहा कि विधि सामाजिक परिवर्तन का एक अत्यंत सुगम साधन है जिसके सही प्रयोग की आवश्यकता है।
लाॅ सोसाइटी के अध्यक्ष तथा अधिष्ठाताए विधि विभाग अमुविए प्रोफेसर शकील अहमद समदानी ने प्रतिभागियों को सम्बोधित करते हुए कहा कि विधि तथा समाज आपस में जुड़े हुए हैं। समाज विधि बनाता है तथा विधि समाज को नियंत्रित करती है। जब भी समाज में बदलाव होता है विधि में परिवर्तन अवश्यभावी है। उन्हांेंने यह भी कहा कि यदि विधि कठोर है तो समाज अनुशासित रहेगा तथा यदि सामाजिक स्थिति अच्छी है तो यह उस देश की विधि में परिलक्षित होगा। प्रोफेसर शकील समदानी ने पवित्र कुरान का उदाहरण देते हुए कहा कि इसमें लगभग 200 आयतें न्याय से सम्बन्धित हैं। उन्होंने अमुवि के संस्थापक सर सैयद अहमद खान का उदाहरण देते हुए कहा कि वे भी एक विधिक ज्ञानी थे। यह सैयद का विधिक ज्ञान तथा शक्ति ही थी जिसके कारण अनेक कानून अस्तित्व में आए। 
डा0 फर्डिनेन्ड इपोकए क्वालिटी अशोरेन्सए सी0ओ0बी0 ब्रुऐमी यूनिवर्सिटीए ओमान ने कहा कि हेट स्पीचए असहिष्णुता तथा सायबर अपराध आज के समय की सबसे महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं जिसमें सोशल मीडिया की अत्यंत महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं जिसमें सोशल मीडिया की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। हमें व्यक्तिगत अधिकार तथा सामाजिक हित में सामंजस्य स्थापित करना होगा। 
वक्ता श्री इरमल बिनो स्त्रूगा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय रिपल्लिक आॅल मैसेडोमिया ने कहा कि आज के समय में मुख्य चुनौती सामाजिक पूॅजी की है। सामजिक पूॅजी का स्तर जितना उच्च होगा। संकट प्रबन्धन उतना ही अच्छा होता है। आज कोरोना के समय यह विश्व की सबसे बड़ी समस्या है।
सम्मेलन के की.नोट स्पीकर डा0 शाद अहमद खान स्टाॅक प्रोफेशनल डेवलेपमेन्टए सी0ओ0बी0ए ब्रुमी विश्वविद्यालयए ओमान ने सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए कहा कि सिविल सोसाइटी साझा मूल्यों से बनती है। उन्होंने कहा कि विधि का समाज तथा राजनीति से अत्यन्त गहरा सम्बन्ध है। जैसे किसी देश की सामाजिक तथा विधिक संरचना बिगड़ती है वह देश भी बिखर जाता है। पाकिस्तान तथा बंग्लादेश इसका जीवंत उदाहरण है। उन्होंने आगे कहा कि इस सामाजिक विधिक संकट में न्यायपालिका तथा अधिवक्ताओं का सामाजिक उत्तरदायित्व बहुत बड़ जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि कोविड.19 के कारण विधि का सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप अत्याधिक बढ़ गया है। ऐसे में न्यायपालिका को आगे आना होगा। भारत में साम्प्रदायिकता बढ़ती जा रही है तथा हमें उन सिद्धान्तों को याद करने की आवश्यकता है जिस पर चलकर हमारे पूर्वजों ने हमें स्वतंत्रता प्रदान करवाई थी।
मेहमानों का स्वागत प्रोक्टर प्रोफेसर वसीम अली ने किया तथा धन्यवाद विभागाध्यक्षए प्रोफेसर जहीरउद्दीन ने किया।
प्रश्नोत्तरी सत्र मोडरेटरए मोहम्मद नासिरए असिस्टेंट प्रोफेसर ने किया। कार्यक्रम का संचालन लाॅ सोसाटी के सेकरेट्री अब्दुल्ला समदानी ने किया। हबीबा शेख ने मेहमानों का परिचय कराया। सम्मेलन में रजिस्ट्रेशन से संबंधित कार्य में डा0 तबस्सुम चैधरीए असिस्टेंट प्रोफेसर तथा तलब अन्जुम ने पूरे किए। कार्यक्रम में रेपोरटियर की भूमिका शोएब अलीए शैलजा सिंह एवं फौजिया तथा को.रेपोरटियर की भूमिका लाएबा फातिमा एवं चन्दन गुप्ता ने निभाई। कार्यक्रम को सफल बनाने में काशिफ सुल्तानए मूट कोर्ट सेकरेट्रीए हबीबा शेखए यश अग्रवालए सोम्या गोयलए आकाश रंजन गोस्वामीए हुनैन खालिद आदि का 

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